Thursday, 12 January 2017

shri shakti


लेखन:  | प्रकाशन: संपादक मंडळ | २५ नोव्हेंबर २०१०
स्त्री शक्तीला सलाम - मराठी लेख | Stree Shaktila Salam - Marathi Article
स्त्री ही त्याग, नम्रता, श्रद्धा व सुजाणपणा याची मुर्ती आहे. ती कोणत्याच बाबतीत कमी नाही. पारंपारिकरित्या पुरूषांची समजली जाणारी क्षेत्रे महिला काबीज करत आहे.
भारतीय तत्वाज्ञानानुसार अस्तित्वाच्या त्रिकोणाच्या पायाच्या एका टोकाला पायाभुत सुविधा व समृध्दी देणारी लक्ष्मी, दुसऱ्या टोकाला शक्ती देणारी व संरक्षण देणारी महाकाली दुर्गा आणि त्रिकोणाच्या शिरोबिंदूमध्ये ज्ञान, कल्पना देणारी महासरस्वती असते. अशा प्रकारे या तीन शक्तींना महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती असे स्थान दिलेले आहे. पूजा जरी पुरूष दैवताची केली जात असली तरी चर्चा होते ती त्यांच्या शक्तीची, त्यांच्या असलेल्या स्त्री शक्तीची.
स्त्री आणि पुरूष यांच्यात केवळ शरीरभेद नाही तर स्त्री अधिक संवेदनशील, श्रध्दावंत आहे, तिला देवत्वाचे अस्तित्व अधिक जाणवते. पुरूषाचे लक्ष्य मात्र भौतिकतेकडे, जडत्वावर अधिकार गाजविण्याकडे अधिक असते.
राजा जनकाच्या राजसभेत याज्ञवलक्याला कसे प्रश्न विचारण्यात आले होते. ते तुम्हाला आठवते का? त्यांना प्रश्न विचारण्यापैकी प्रमुख होती वाचवनवी नामक एक कुमारी मोठी वाक्पटू होती. त्या काळी अशा स्त्रियांना ब्रह्मवादिनी म्हणत. एखाद्या कुशल धनुर्धराच्या हातात चमकणारे दोन बाण असावेत तसे माझे प्रश्न आहेत असे ती म्हणाली. त्या ठिकाणी तिच्या स्त्रीत्वासंबंधी कोणताही प्रश्न उपस्थित केलेला नाही.
तसं पाहता समाजातील स्वतःचे न्यायस्थान जगभरात कुठेही भारतातील महिलांना पुरूषांप्रमाणे उक्ते मिळाले नाही. गेल्या शतकात त्यांना कराव्या लागलेल्या संघर्षाच्या आणि त्यातून महिलांनी साधलेली प्रगतीचा थोडक्यात प्रवास १९५० मध्ये प्रेम माथुर यांना भारतातील पहिल्या व्यावसायीक महिला वैमानिक होण्याचा मान, १९५२ च्या ऑलिपिंक स्पर्धामध्ये पुरूष व महिलांना एकत्र खेळण्याची संधी, भारत देशाच्या पहिल्या महिला पंतप्रधान इंदिरा गांधी, सुचेता कृपलानी यांना भारतातील पहिल्या मुख्यमंत्री होण्याचा मान, भारतीय पोलिस सेवेत अधिकारी पदावर किरण बेदी यांची निवड पोलिस सेवेत अधिकारी पदावर दाखल झालेल्या पहिल्या महिला, मदर तेरेसा यांना शांततेचा नोबेल पुरस्कार जाहीर, भारतीय सैन्य दलात महिलांचा प्रवेश, भारताच्या राष्ट्रपती पदी महिलेची निवड प्रतिभाताई पाटिल, गानसम्राज्ञी लता मंगेशकर यांना भारतरत्न किताब, भारतात स्थानिक स्वराज्य संस्थांमध्ये महिलांना ५०% आरक्षण.



Sunday, 8 January 2017

आज मीडिया में, सोशल मीडिया में हर जगह बात होती है, चिल्लाहट मचती है तो सिर्फ और सिर्फ कन्या भ्रुण हत्या की। लेकिन भ्रुण-हत्या (जीसकी जांच ही न की गई हो, लडका है या लडकी) की कोई भी बात ही नहीं करता। भ्रुण, चाहे उसने इस संसार में कदम न रखा हो; लेकिन उसमें एक जीवात्मा तो रहती ही है न! फीर क्यों हम बहुत ही निर्दयता से भ्रुण-हत्या करते है? जिसका हमें कोई अफसोस भी नही होता। यह मैं निम्न दो सत्य घटनाओं से स्पष्ट करना चाहुंगी। दोनों घटनाओं में सिर्फ पात्रों के नाम बदल दिए गए है।

घटना 1-

"क्या बताऊ, शादी को दो साल हो गए लेकिन अभी तक खुशी ने कोई खुशखबर नहीं सुनाई"  "डॉक्टर क्या बोलते है?"  "डॉक्टरों के मुताबिक दोनों नॉर्मल है, फिर भी न जाने क्यों...मेरे तो कर्म ही फुटे है, जो बांझ बहू गले पडी!!" जब सरला चाची ने ऐसा कहा तो मैंने खुशी की तरफ देखा। उसके चेहरे पर दु:ख, अपमान की पिडा, बेबसी सब कुछ एक साथ नजर आए। ऐसे में मैं भी बस "देखिए चाची जी, जब सब नॉर्मल है, तो जल्द ही आपको खुशखबरी सुनने मिलेगी।" इतना कह कर चुप हो गई। ईश्वर की कृपा से साल भर बाद ही खुशी ने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया। पुरा परिवार खुशी से झूम उठा।


तीन साल बाद अचानक किसी कार्यवश उनके यहां जाना हुआ तो खुशी बहुत ही थकी-थकी सी लग रही थी। पुछने पर उसने बताया, ''अभी दस दिन पहले ही गर्भपात करवाया है इसलिए..."  "क्या?"  मैं हैरान रह गई। "क्या तुम्हें दुसरा बच्चा नहीं चाहिए?"  "नहीं, ऐसी बात नहीं है, लेकिन अमित भैया (देवर) की शादी पक्की हो गई है। शादी दो महिने बाद है। मम्मी जी का कहना है, "घर की बहू यदि गर्भवती रहेगी तो शादी के काम कौन करेगा? शादी तो जींदगी में सिर्फ एक बार होती है लेकिन बच्चें तो बाद में भी पैदा किए जा सकते है, इसलिए...!!" "क्या तुम्हारें पति ने भी विरोध नहीं किया?" "वे माँ के सामने कूछ नहीं बोलते है।" मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या प्रतिक्रिया दूं? मैं सोचने लगी कि क्या हो गया है सरला चाची की सोच को? अच्छी पढी-लिखी है। घर के सभी लोग पढे-लिखें है। फिर सभी ने कैसे गर्भपात के लिए हां कर दी? बच्चा माँ के गर्भ के अंदर होने पर भी उसमें एक आत्मा तो होती ही है न। फिर हम उसे हत्या क्यों नहीं मानते? जितना पाप एक जीवित व्यक्ति की हत्या पर होता है उससे कहीं अधिक पाप भ्रुण-हत्या पर होगा क्योंकि उस भ्रुण ने तो अभी इस दुनिया में कदम भी नहीं रखा है। वो यह दुनिया देखें-समझे इसके पहले ही निर्दयी लोग उसे मारना चाहते है! सरला चाची तो बहुत ही धार्मिक है। जब देखों तब भागवत, रामायण, सुंदरकांड, मंगल पाठ सभी जगह जाती रहती है। फिर वो एक जीव-हत्या करने (और वो भी सिर्फ काम की वजह से) कैसे तैयार हो गई? पहले बच्चा नहीं हुआ तो बहू को कोसा गया, जब एक बार बच्चा हो गया तो बहू को बच्चा पैदा करने की मशीन समझा जाने लगा! जब चाहे तब उत्पादन कर लो! मशिन को कोई भावनाएं थोडी ही होती है!!!


घटना 2-

नेहा ने दुसरी बार गर्भपात करवाया क्योंकि उसे पहले से दो बच्चे थे और उन्हें तिसरा बच्चा नहीं चाहिए था। परिवार नियोजन के इतने साधन होने के बावजुद, उसके पति को कोई भी साधन जंच नहीं रहा था। नेहा के परिवारवालों ने, नेहा की परिवार नियोजन वाली शल्यक्रिया इसलिए नहीं करवाई थी कि जब भी गांव में सरकारी शिबीर आयोजित होंगे तब शल्यक्रिया करवायेंगे ताकी बहुत ही कम रुपयों में शल्यक्रिया हो सके। और ऐसे शिबीर गांव में आने से पहले ही उसे गर्भ रह जाता!! उसके पति को किसी ने बता दिया था कि पुरुष नसबंदी करने से पुरुषत्व में कमी आती है इसलिए उसके पति ने नसबंदी नहीं करवाई। परिणामत: नेहा को दुसरी बार गर्भपात करवाना पड रहा था। असल में लोग छोटी-छोटी बिमारी के लिए भी (जिनका इलाज घर में भी संभव है) डॉक्टर के पास जाते है। लेकिन वास्तव में जिन बातों के लिए डॉक्टरी सलाह की जरुरत होती है, वे बातें अपने यार-दोस्तों को पुछ्ते फिरते है!! आखिर हम लोग गर्भपात को इतना सहज क्यों लेते है? गर्भपात न होकर जैसे कोई खेल हो गया! हम अपने ही अंश की हत्या इतनी आसानी से कैसे करते है?


खुशी और नेहा ये सिर्फ दो उदाहरण नहीं है। ऐसी कई खुशी और नेहा, हमारे आस-पास आज भी मौजूद है जो अपनी ममता का गला घोंटने मजबूर है। आखिर हम कब समझेंगे कि भ्रुण भी हमारी तरह ही सांस लेता है, इसलिए वह भी एक जीव ही है। अत: भ्रुण-हत्या भी एक जीव-हत्या है!!

गर्भपात से नारी का शरीर कमजोर होता है, वो अलग!एक अध्ययन के मुताबिक, हर साल देश में 67 लाख गर्भपात होते है और लगभग 20000 महिलाओं की गर्भपात संबंधी जटिलताओं के कारण मृत्यू हो जाती है!!

अमेरिका में कूछ साल पहले एक डॉक्टर ने एक विडिओ फिल्म बनाई थी। जिसमें यह बताया गया था कि जब माँ-बाप बच्चे का गर्भपात करने की सिर्फ सोचते भर है, तभी से भ्रुण पर क्या असर होता है। माँ के गर्भ में भी वह नन्हीं सी जान कितनी डरती है। माँ का गर्भ, दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह! लेकिन वहां पर भी वो नन्हीं सी जान डर से कंपकंपाती है! उसके मस्तिक से जो डर वाली तरंगे निकलती है, वो देख कर पत्थर भी पिघलने लगे! और जब डॉक्टर गर्भपात करते है तब वो भ्रुण के कैसे टूकडे-टूकडे कर उसे बाहर निकालते है, इसका उन्होंने वीडिओ बनाया। वो दिल दहलाने वाला विडिओ यदि हम देख ले तो मैं विश्वास से कहती हूं कि हम सपने में भी भ्रुण-हत्या करने की ना सोचे!!

Saturday, 7 January 2017

महिलाओं के अधिकार, वह अधिकार है जो प्रत्येक महिला या बालिका का विश्वव्यापी समाजों में पहचाना हुआ जन्मसिद्ध अधिकार या हक है। १९वीं सदी में महिला हक संग्राम और २०वीं सदी में फेमिनिस्ट आंदोलन का यह आधार रहा है। कई देशों में यह हक कानूनी तौर पर, अंदरूनी समाज द्वारा या लोगों के व्यवहार में लागू होता है तो कई देशों में यह प्रचलित नहीं है। कई देशों में व्यापक तौर पर मानवाधिकार का दावा निहित इतिहासिक और परम्परागत झुकाव के नाम पर महिलाओं और बालिकाओ का हक पुरुषों और बालकों के पक्ष में दे दिया जाता है। महिलाओं के अधिकार के विषय मे कुछ हक अखंडता और स्वायत्तता शारीरिक करने की आजादी, यौन हिंसा से मुक्ति; मत देने की आजादी; सार्वजनिक पद धारण करने की आजादी; कानूनी कारोबार में प्रवेश करने की आजादी;पारिवारिक कानून में बराबर हक; काम करने की आजादी और समान वेतन की प्राप्ति; प्रजनन अधिकारों की स्वतंत्रता; शिक्षा प्राप्ति का अधिकार।

स्त्री भ्रूणहत्या

                 स्त्री भ्रूणहत्या  ( वरदाची कविता)
थांबा! या जगात जन्म घेण्याआधीच मला का मारून टाकताय?
मी एक मुलगी आहे म्हणून? 
आज कित्येक नवजात मुलींचा हाच मूक आक्रोश आहे!
जगातील कित्येक सुंदर गोष्टी पाहण्यापासून, अनुभवण्यापासून आम्हांला का वंचित ठेवताय?

मी तुमचाच एक अंश, तुम्हीच प्राण ओतलेत, तुम्हीच माझ्या शरीरात रक्त पोहचवलंत...... 
आणि आज.. तुमच्याच अंशाला, तुमच्याच प्राणाला, तुमच्याच रक्ताला, तुम्ही मारताय? 
का? मी एक मुलगी आहे म्हणून?

मुलगा म्हणजे वारस, वंशाचा दिवा... आणि मुलगी?
मुलगी म्हणजे परक्याचं धन? इतरांना अभिमानानं सांगता... पहिली बेटी, धनाची पेटी!
आणि तुमच्याच धनाच्या पेटीला तुम्ही दूर सारताय? का? 
धनाची पेटी एक मुलगी आहे म्हणून?

मुलगा तुमची वंशवेल वाढवतो, आणि मुलगी तिची स्वत:ची बीजं निर्माण करते.....
तुम्ही एका स्त्रीच्याच पोटी जन्मलात, मग मुलगाच हवा असा अट्टहास का?
तुम्ही मुलगी मारताय, म्हणजे एक भावी मातृत्वच गमावताय.
तुमचेच प्राण, तुमचाच अंश, तुमचंच रक्त, तुमचीच धनाची आणि आनंदाची पेटी म्हणजे मी!! मुलगी!
तेव्हा...... इतरांना मुलगी झाली तर म्हणा, अभिनंदन मुलगी आहे! 
आणि मीही तुम्हांला सांगतेय, मुबारक हो! मुलगी झालीय !